IIT JEE-NEET में छात्रों की सबसे बड़ी परेशानी स्कूल की पढ़ाई? सरकारी पैनल ने बताया कोचिंग नहीं, क्या जरूरी है
सरकारी पैनल की एक हालिया रिपोर्ट कहती है कि जेईई और नीट यूजी जैसी बड़ी परीक्षाओं का लेवल उनकी तैायरी से कहीं ज्यादा है। खासकर नीट फिजिक्स के पेपर ने चिंता बढ़ा दी है। क्योंकि यह रिपोर्ट ऐसे समय पर सामने आई है जब केंद्र स…

सौजन्य से:- Navbharat Times
सरकारी पैनल की एक हालिया रिपोर्ट कहती है कि जेईई और नीट यूजी जैसी बड़ी परीक्षाओं का लेवल उनकी तैायरी से कहीं ज्यादा है। खासकर नीट फिजिक्स के पेपर ने चिंता बढ़ा दी है। क्योंकि यह रिपोर्ट ऐसे समय पर सामने आई है जब केंद्र सरकार ने स्टूडेंट्स के लिएफ्री ऑनलाइन कोचिंग प्रोग्राम शुरू करने की घोषणा की है।
स्कूलों का सिलेबस है IIT JEE-NEET स्टूडेंट्स की परेशानी
सरकारी पैनल की रिसर्च NEET UG-IIT JEE एग्जाम लेवल और स्टूडेंट्स की तैयारी के बीच बड़े अंतर की ओर इशारा करती है। इन दो बड़ी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे लाखों के लिए सबसे बड़ी परेशानी शायद मेहनत नहीं, बल्कि स्कूलों का सिलेबस है, क्योंकि स्कूलों की पढ़ाई और जेईई-नीट परीक्षाओं के लिए लेवल में बड़ा अंतर देखना को मिला है। शायद स्टूडेंट्स के लिए अलग से कोचिंग की की भी यह एक वजह हो सकती है।
नीट का एवरेज एग्जाम भी स्टूडेंट्स के लिए टफ
पैनल ने नीट यूजी के बीते तीन साल 2023, 2024 और 2025 के पेपर्स की जांच की औऱ पाया कि एग्जाम का ओवरऑल डिफिकल्टी लेवल परीक्षार्थियों की एबिलिटी के लेवल से काफी ऊपर था। इसमें फिजिक्स का पेपर एवरेज स्टूडेंट्स की पहुंच से बाहर का था।
नीट यूजी रिजल्ट और रैंक पर असर
कमेटी के एनालिसिस से पता चला कि अलग-अलग विषयों के पेपर का डिफिकल्टी लेवल अलग होने की वजह से नीट यूी रिजल्ट और रैंक पर बड़ा असर पड़ता है। पिछले तीन साल के पेपरों की जांच के बाद, बॉयोलॉजी के मुकाबले फिजिक्स ज्यादा टफ था। इसी वजह से अलग-अलग सब्जेक्ट्स में स्टूडेंट्स की परफॉर्मेंस पर फर्क पड़ता है और ओवरऑल मार्क्स व रैंक पर असर पड़ता है।
IIT-JEE भी एवरेज स्टूडेंट की तैयारी से बाहर
नीट की तरह आईआईटी जेईई में भी यही पैटर्न निकलकर सामने आया है। सरकारी पैनल ने जनवरी 2026 में 22, 23, 24, 28 और 29 को 10 शिफ्ट में हुए जेईई पेपर्स का डिफिकल्टी लेवल चेक किया और पाया कि एवरेज स्टूडेंट्स के हिसाब से पेपर्स का लेवल काफी अलग था। स्टडी के मुताबिक, डिफिकल्टी लेवल ज्यादा उम्मीदवारों की क्षमता से अधिक था। यही वजह थी कि ज्यादातर स्टूडेंट्स के मार्क्स कम थे, सिर्फ कुछ ही उम्मीदवार अच्छे मार्क्स लाने में सफल रहे।
जेईई-नीट एग्जाम और स्कूल सिलेबस में बड़ा अंतर
सरकारी स्टडी की माने तो जेईई-नीट एस्पिरेंट्स की सबसे बडी समस्या कॉम्पिटिटिव एग्जाम या एंट्रेंस एग्जाम और स्कूल में हो रही पढ़ाई के बीच बड़ा अतंर है। कॉम्पिटिटिव एग्जाम में कॉन्सेप्ट्स की अच्छी समझ, जानकारी का इस्तेमाल, सोच, और प्रॉब्लम सॉल्विंग अप्रोच पर जोर दिया जाता है, जो स्कूलों में चल रही पढ़ाई से बहुत ऊपर है। इसलिए स्टूडेंट्स पर कोचिंग की अतिरिक्त पढ़ाई को बोझ बढ़ता है।
कोचिंग नहीं, स्टूडेंट्स की तैयारी के लिए कहां ध्यान देना चाहिए?
पैनल की रिसर्च के बाद, यह कहना गलत नहीं होगा कि जेईई और नीट जैसी बड़ी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले स्टूडेंट्स के लिए कोचिंग पर नहीं, बल्कि स्कूल लेवल पर फोकस करना जरूरी है। कमेटी ने NCERT और बोर्ड के सिलेबस और JEE और NEET जैसे एंट्रेंस एग्जाम की जरूरतों के बीच बेहतर तालमेल बिठाने की सिफारिश की है।
अलग-अलग बोर्ड के स्कूल सिलेबस में भी बेहतर तालमेल की बात कही है, ताकि देश के अलग-अलग हिस्सों के छात्रों के पास नेशनल लेवल एंट्रेंस टेस्ट में बैठने से पहले एक जैसा एकेडमिक आधार हो।
बोर्ड एग्जाम और कॉम्पिटिटिव एग्जाम में 6 महीने का अंतर
इसका मुख्य मकसद यह पक्का करना है कि छात्र बाहरी कोचिंग पर बहुत ज्यादा निर्भर रहने के बजाय अपनी रेगुलर स्कूली पढ़ाई के जरिए कॉम्पिटिटिव एग्जाम की तैयारी कर सकें। पैनल ने स्कूल बोर्ड एग्जाम और एंट्रेंस टेस्ट के बीच कम से कम छह महीने का अंतर रखने का भी सुझाव दिया है।
यह भी सुझाव दिया गया है कि एंट्रेंस एग्जाम साल में कम से कम दो बार होने चाहिए। ऐसी व्यवस्था से छात्रों पर दबाव कम हो सकता है और उन्हें तैयारी करने और एग्जाम में बैठने में ज्यादा सुविधा मिल सकती है।
केंद्र सरकार द्वारा जारी फ्री ऑनलाइन कोचिंग ड्राफ्ट में भी इस बात पर जोर दिया गया है कि कोचिंग की समस्या को सिर्फ छात्रों को तैयारी का एक और प्लेटफॉर्म देकर हल नहीं किया जा सकता। अगर स्कूल की शिक्षा और एंट्रेंस एग्जाम का स्तर बहुत अलग-अलग बना रहता है, तो छात्र इस अंतर को कम करने के लिए खास कोचिंग की तलाश करते रहेंगे।
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