1982 का कलंक, 2026 में राहत : वित्तरहित शिक्षा नीति के खिलाफ 43 साल के संघर्ष को मिली मंजिल
1982 का कलंक, 2026 में राहत : वित्तरहित शिक्षा नीति के खिलाफ 43 साल के संघर्ष को मिली मंजिल बिहार में वित्तरहित शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ शिक्षकों का संघर्ष 43 वर्षों का है। शिक्षक दिवस पर मुख्यमंत्री ने वेतनमान देने की घ…

सौजन्य से:- livehindustan.com
1982 का कलंक, 2026 में राहत : वित्तरहित शिक्षा नीति के खिलाफ 43 साल के संघर्ष को मिली मंजिल
बिहार में वित्तरहित शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ शिक्षकों का संघर्ष 43 वर्षों का है। शिक्षक दिवस पर मुख्यमंत्री ने वेतनमान देने की घोषणा की है, लेकिन शिक्षक संगठनों का कहना है कि यह तब तक सार्थक नहीं होगी जब तक 'राज्यकर्मी' का दर्जा नहीं दिया जाता। इस संघर्ष में कई शिक्षक लंबे समय से बिना वेतन काम कर रहे हैं।
1982 का कलंक, 2026 में राहत : वित्तरहित शिक्षा नीति के खिलाफ 43 साल के संघर्ष को मिली मंजिल या, चार दशक का इंतजार, आखिर टूटी चुप्पी : वित्तरहित शिक्षकों को शिक्षक दिवस पर मिला वेतनमान का तोहफा रेल रोको से लेकर विधानसभा घेराव तक की वित्तरहित शिक्षकों ने चार दशक की लड़ाई लाई रंग वेतनमान तो मिला अब राज्यकर्मी के दर्जे की मांग , वित्तरहित शिक्षकों का संघर्ष अभी बाकी 1982 में लागू नीति ने बिगाड़ी हजारों शिक्षकों की रोजी-रोटी, अब जाकर मिली आंशिक राहत फोटो : आपीएस कॉलेज : घोषणा के बाद हरनौत के आरपीएस कॉलेज में शनिवार को प्राचार्य डॉ. उपेन्द्र कुमार सिन्हा का पुष्पगुच्छ देकर स्वागत करते कर्मी। बिहारशरीफ, कार्यालय संवाददाता। बिहार में वित्तरहित शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ शिक्षकों और शिक्षकेतर कर्मचारियों की लड़ाई चार दशक से ज्यादा पुरानी है।
शिक्षक दिवस पर हुई घोषणा
और, अब जाकर इस लंबे संघर्ष को एक ठोस नतीजा मिलता दिख रहा है। शिक्षक दिवस पर मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने वित्तरहित संस्थानों के आंतरिक स्रोत और सरकारी अनुदान को मिलाकर शिक्षकों को वेतनमान देने की घोषणा की है। लेकिन, शिक्षक संगठनों का कहना है कि यह घोषणा तभी सार्थक होगी, जब इसे व्यापक बनाकर राज्यकर्मी का दर्जा भी दिया जाए। 19 अक्टूबर 1982 को तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. जगन्नाथ मिश्र के कार्यकाल में वित्तरहित शिक्षा नीति लागू की गई थी। इसके तहत प्राथमिक विद्यालयों से लेकर डिग्री महाविद्यालयों तक को स्वीकृति व संबद्धता तो दे दी गई। लेकिन, वेतन की कोई नियमित व्यवस्था नहीं बनाई गई। नतीजा यह हुआ कि इन संस्थानों में पढ़ाने वाले हजारों शिक्षक-कर्मचारी वर्षों तक बिना तय वेतन के काम करने को मजबूर हो गए, और उनके सामने रोजी-रोटी का संकट खड़ा हो गया।
सड़क से सदन तक लड़ाई
सड़क से सदन तक लड़ाई : सरकार और प्रबंधन से बातचीत व ज्ञापनों का दौर बेनतीजा रहने पर शिक्षक सड़क पर उतरे। 25 सितंबर 1989 को पटना के चितकोहरा गुमटी के पास डॉ. रघुवंश प्रसाद सिंह के नेतृत्व में रेल रोको आंदोलन हुआ। इसमें कई शिक्षक-कर्मचारी गिरफ्तार किए गए। दबाव के आगे झुकते हुए दिसंबर 1989 में वित्तरहित शिक्षा नीति समाप्त करने की सैद्धांतिक घोषणा हुई। लेकिन, जमीन पर बदलाव सुस्त रहा। सितंबर 1996 में विभिन्न संगठनों ने मिलकर वित्तरहित शिक्षा संयुक्त संघर्ष मोर्चा बनाया। 6 मई 2008 को विधानसभा के मुख्य गेट पर हुए आंदोलन के बाद परीक्षा परिणाम आधारित अनुदान की घोषणा हुई। इसके बाद 2014-15 में एक और आंदोलन के दबाव में चयन समिति गठित कर शिक्षकों की नियुक्ति को मान्यता दी गई।
अधूरी है मांगों की फेहरिस्त
अब भी अधूरी है मांगों की फेहरिस्त : बिहार प्रदेश संबद्ध डिग्री महाविद्यालय शिक्षक शिक्षकेतर कर्मचारी महासंघ के उपाध्यक्ष डॉ. उपेंद्र कुमार सिंह व आंदोलनरत रहे डॉ. सतेन्द्र प्रसाद ने बताया कि शिक्षक अब भी सेवा शर्त, वेतन, पेंशन, लंबित अनुदान के एकमुश्त भुगतान और राज्यकर्मी के दर्जे जैसी मांगों को लेकर संघर्षरत हैं। कहा कि शिक्षक दिवस पर हुई घोषणा स्वागत योग्य है। लेकिन, सरकार को इसे व्यापक बनाकर कॉलेजों के आंतरिक स्रोत और कमी वाली राशि में नियमित अनुदान उपलब्ध कराना होगा। साथ ही, निर्धारित वेतनमान के साथ राज्यकर्मी का दर्जा दिए बिना शिक्षकों का सम्मान और बिहार को वित्तरहित शिक्षा के कलंक से मुक्ति दिलाने का मकसद अधूरा ही रहेगा। चार दशक की इस लड़ाई में हजारों शिक्षकों की जिंदगी के सबसे उत्पादक साल गुजर चुके हैं। अब सवाल यह है कि क्या ताजा घोषणा सिर्फ एक और आश्वासन बनकर रह जाएगी, या इस बार वाकई बिहार वित्तरहित शिक्षा के दंश से मुक्त होगा।
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